जापान का नाम सुनते ही हमारे जेहन में क्या आता है? अनुशासन, तकनीक, सफाई… है न? लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जापान की इस चर्चित जीवनशैली के पीछे एक साधारण सी चीज़ का बड़ा हाथ है – साइकिल!
हां, सही सुना आपने। वो छोटी-सी साइकिल, जिसे हम अक्सर “गरीबों का साधन” समझ बैठते हैं, जापान में तो जैसे जीवन की रीढ़ है। आइए आपको ले चलते हैं इस साइकिल-प्रेमी देश की सैर पर।
हवा भी करेगी शुक्रिया Why Japan Encourages Bicycle
टोक्यो हो या ओसाका, जापान के बड़े शहरों में गाड़ियों की कोई कमी नहीं। फिर भी वहां की हवा में वो स्मॉग नहीं दिखता जो हमारे शहरों की पहचान बन गया है। राज़ क्या है?
बस इतना कि जापानी लोग छोटी दूरी के लिए गाड़ी निकालने की बजाय साइकिल उठा लेते हैं। सब्जी लानी हो, बच्चे को स्कूल छोड़ना हो, ऑफिस जाना हो – साइकिल ही साथी। न पेट्रोल जले, न धुआं उड़े। पर्यावरण को इससे अच्छा और क्या तोहफा हो सकता है?
सेहत का राज़ खुल गया?
जापानी लोग दुनिया में सबसे लंबी उम्र जीने वालों में गिने जाते हैं। उनकी डाइट का तो सभी कायल हैं, लेकिन एक और राज़ है – रोज़ाना की साइकिलिंग।
सुबह उठे, ऑफिस का रास्ता तय किया, शाम को वापसी – ये रोज़ का साइकिल चलाना ही तो है जो दिल को मज़बूत रखता है, वज़न कंट्रोल में रखता है और तनाव भी भगाता है। जापान में मोटापा कम दिखता है तो इसकी एक वजह ये भी है।
रास्ते में नहीं अटकते जापानी
हमारे शहरों की हालत देखिए – सुबह 9 बजे निकले तो 10 बजे पता चले कि ऑफिस पहुंचे भी या नहीं। जापान में भीड़ तो कम नहीं, लेकिन वहां सड़कों पर साइकिल के लिए अलग लेन हैं। साइकिल पार्किंग का भी पक्का इंतज़ाम है।
यानी जापानी साइकिल वाला न तो रास्ता रोकता है, न ही खुद कहीं अटकता है। अनुशासन की यही तो कहानी है।
सरकार भी है साथ | Why Japan Encourages Bicycle
जापान सरकार ने साइकिल को बढ़ावा देने के लिए कमर कस ली है। स्कूलों में बच्चों को साइकिल से लाने-ले जाने को प्रोत्साहन मिलता है। कई कंपनियां तो अपने कर्मचारियों को साइकिल से आने पर इनाम तक देती हैं।
सुरक्षित साइकिल ट्रैक बनाना, पार्किंग की व्यवस्था करना, ट्रैफिक नियम बनाना – सरकार ने हर वो काम किया है जिससे लोगों को साइकिल चलाने में सहूलियत हो।
स्मार्ट सिटी का असली मतलब
जापान ने अपने शहरों को इस तरह बसाया है कि सार्वजनिक परिवहन और साइकिल नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़े हैं। लोग साइकिल से स्टेशन जाते हैं, ट्रेन पकड़ते हैं, लंबा सफर तय करते हैं। फिर उतरकर फिर साइकिल।
ये है न सच्ची स्मार्ट सिटी! न समय बरबाद, न ईंधन बरबाद। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का जीता-जागता उदाहरण।
जेब पर भी हल्का
गाड़ी खरीदो, पेट्रोल डलवाओ, मेंटेनेंस कराओ – ये तो बहुत भारी पड़ता है। साइकिल? एक बार खरीद लो, सालों साथ निभाती है। जापान के आम आदमी के लिए ये किफायती विकल्प है।
और साइकिल का कारोबार भी जापान की अर्थव्यवस्था में हिस्सा डालता है – निर्माण हो, पार्ट्स बनें, नए-नए डिज़ाइन आएं – रोजगार के कितने ही दरवाज़े खुलते हैं।
एक संस्कृति बन गई साइकिल
जापान में साइकिल सिर्फ सवारी नहीं, एक तहज़ीब है। स्कूली बच्चे हों या बुजुर्ग, ऑफिस कर्मचारी हों या दुकानदार – सब साइकिल पर नज़र आ जाएंगे। ये सबको एक समान करने वाला साधन है।
और जापानी सड़कों की सफाई? वो तो किसी से छिपी नहीं। साइकिल पार्किंग में भी अनुशासन – ये दिखाता है कि जापानी समाज ने जिम्मेदारी को कैसे अपने खून में उतार लिया है।
हम क्या सीख सकते हैं?
अब ज़रा सोचिए, हमारे देश में क्या हो अगर साइकिल को इतना महत्व मिले? प्रदूषण कम होगा, लोग स्वस्थ होंगे, ट्रैफिक कम होगा, पेट्रोल का बिल भी कम आएगा।
जापान ने दिखा दिया है कि अगर सही प्लानिंग हो, सरकार साथ दे और लोग अनुशासन दिखाएं, तो एक छोटी सी साइकिल बड़ा बदलाव ला सकती है।
आखिर में
जापान साइकिल को इसलिए अपनाता है क्योंकि वहां की सोच है – स्वस्थ नागरिक, स्वच्छ पर्यावरण, स्मार्ट शहर। साइकिल भले ही साधारण लगे, लेकिन इस साधारण से साधन ने जापान को असाधारण बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
तो अगली बार जब आप साइकिल देखें, तो उसे सिर्फ दो पहियों का साधन न समझें। हो सकता है, वो छोटी-सी साइकिल ही हमारी दुनिया को बचाने की चाबी हो। जापान ने तो ये मान लिया है, अब बारी है बाकी दुनिया की।