भारत की पारंपरिक वस्त्र कला की बात करें तो कलमकारी का नाम बड़े ही आदर से लिया जाता है। और सच कहूं तो ये सिर्फ एक साड़ी नहीं है – ये एक कहानी है, जो कपड़े पर धीरे-धीरे उकेरी जाती है। दक्षिण भारत में, खासकर आंध्र प्रदेश में जन्मी ये कला आज भी उन्हीं प्राकृतिक रंगों और हाथों के स्पर्श से बनती है, जैसे सदियों पहले बनती थी।
“कलमकारी” नाम सुनते ही दो शब्द दिमाग में आते हैं – ‘कलम’ यानी पेन और ‘कारी’ यानी कारीगरी। यानी वो कला जो पेन से की जाए। ये नाम ही इसकी पूरी पहचान बता देता है कि इसमें मशीनों का नहीं, बल्कि कारीगर के हाथों का जादू चलता है।
कैसे शुरू हुआ ये सफर? South Indian Kalamkari Saree
कलमकारी की जड़ें करीब 3000 साल पुरानी हैं। सोचिए, इतने सालों से ये कला हमारे देश में जीवित है! पुराने जमाने में मंदिरों की सजावट के लिए और धार्मिक कहानियों को दर्शाने के लिए इसका इस्तेमाल होता था। श्रीकालाहस्ती और मछलीपट्टनम इस कला के दो मुख्य केंद्र रहे हैं।
दिलचस्प बात ये है कि दोनों जगहों की शैलियां अलग हैं। श्रीकालाहस्ती में पूरी तरह हाथ से पेंटिंग होती है, वहीं मछलीपट्टनम में लकड़ी के ब्लॉक से छापा जाता है। लेकिन दोनों में प्राकृतिक रंग ही इस्तेमाल होते हैं और दोनों पर रामायण-महाभारत की कहानियां जीवंत हो उठती हैं।
मुगल काल में इस कला को नया आयाम मिला – फूल-पत्तियां और फारसी डिज़ाइन इसमें शामिल हुए। यूं कहें कि ये कला समय के साथ बहती रही, पर अपनी जड़ों से जुड़ी रही।
एक कलमकारी साड़ी बनने तक का सफर South Indian Kalamkari Saree
अब बात करते हैं असली मजे की – ये साड़ियां बनती कैसे हैं? भई, ये कोई आधे घंटे का काम नहीं है। पूरी 15 से 23 स्टेप्स से गुजरना पड़ता है। चलिए, आपको इस सफर पर ले चलते हैं।
शुरुआत कपड़े से
सबसे पहले सूती या रेशमी कपड़े को गाय के गोबर से साफ किया जाता है। हां, सही सुना आपने! ये प्राकृतिक तरीका है कपड़े को शुद्ध करने का। फिर ब्लीचिंग प्रक्रिया से गुजरता है कपड़ा।
दूध-हरड़ का स्नान
अब कपड़े को दूध और हरड़ (जिसे मायरोबालन कहते हैं) के घोल में डुबोया जाता है। इससे रंग कपड़े से ऐसे चिपकेगा कि सालों नहीं छूटेगा।
डिज़ाइन की रूपरेखा
असली जादू अब शुरू होता है। कारीगर बांस की बनी कलम उठाता है और हाथ से डिज़ाइन की आउटलाइन बनाना शुरू करता है। काला रंग बनता है गुड़ और लोहे की कील के घोल से। हैरान कर देने वाली बात है न?
रंगों की दुनिया
कलमकारी में सिर्फ प्रकृति से लिए गए रंग इस्तेमाल होते हैं:
- लाल रंग – मदार की जड़ से
- नीला रंग – इंडिगो के पौधे से
- पीला रंग – हल्दी या अनार के छिलके से
- हरा रंग – नीले और पीले को मिलाकर
रंग भरना और धूप में सुखाना
हर रंग भरने के बाद कपड़े को धोया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। ये प्रक्रिया दिनों या हफ्तों चल सकती है। यही वजह है कि हर कलमकारी साड़ी बिल्कुल यूनिक होती है – दो साड़ियां कभी एक जैसी नहीं हो सकतीं।
सिर्फ साड़ी नहीं, संस्कृति की धरोहर
कलमकारी साड़ी सिर्फ पहनने की चीज नहीं है। ये हमारी संस्कृति और आध्यात्मिकता से जुड़ी है। पुराने समय में मंदिरों में पर्दों और सजावट के लिए इन्हीं कपड़ों का इस्तेमाल होता था।
इन साड़ियों पर देवी-देवताओं के चित्र होते हैं, प्रकृति के नज़ारे होते हैं, पौराणिक कहानियां होती हैं। ये हमारी लोककला को जिंदा रखने का एक माध्यम है।
प्रकृति का साथ
आजकल फैशन इंडस्ट्री में केमिकल डाई का जमाना है। ऐसे में कलमकारी एक ताज़ी हवा के झोंके की तरह है। पूरी तरह इको-फ्रेंडली। न पानी प्रदूषित होता है, न त्वचा को नुकसान। स्लो फैशन और सस्टेनेबल फैशन का ये सबसे सुंदर उदाहरण है।
आज के समय में कलमकारी
अब कलमकारी सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं है। कुर्ते, दुपट्टे, होम डेकोर, वॉल हैंगिंग – हर चीज़ में इसका इस्तेमाल हो रहा है। बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर इसे अपने कलेक्शन में शामिल कर रहे हैं।
लेकिन एक बात का ध्यान रखिएगा – बाजार में मशीन से छपी नकली कलमकारी भी आ रही है। असली कलमकारी पहचाननी हो तो उसमें हल्की अनियमितता होगी, क्योंकि वो पूरी तरह हाथ से बनी होती है। उसकी खामियां ही उसकी खूबसूरती हैं।
आखिर में
साउथ इंडियन कलमकारी साड़ी सिर्फ एक कपड़ा नहीं है – ये इतिहास है, संस्कृति है, प्रकृति का उपहार है। ये हमें याद दिलाती है कि असली सुंदरता समय, मेहनत और परंपरा में छिपी होती है।
जब आप कलमकारी साड़ी पहनते हैं, तो आप सिर्फ एक परिधान नहीं पहन रहे। आप सदियों पुरानी विरासत को अपने ऊपर सजा रहे हैं। अगर भारतीय पारंपरिक कला, हैंडलूम और नेचुरल फैशन में आपकी रुचि है, तो कलमकारी साड़ी आपके लिए ही बनी है।
तो अगली बार जब कभी कोई खास मौका हो, या बस मन करे कुछ अलग पहनने का, तो एक कलमकारी साड़ी जरूर ट्राई करिएगा। भरोसा मानिए, आप सिर्फ सुंदर नहीं लगेंगी, बल्कि एक कहानी भी साथ लेकर चल रही होंगी।