सबूदाना, जिसे अंग्रेज़ी में Sago या कई जगह Tapioca pearls भी कहा जाता है, भारत में उपवास के खाने के रूप में बहुत लोकप्रिय है। खासकर नवरात्रि, एकादशी और व्रत के दिनों में इससे खिचड़ी, वडा और खीर बनाई जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि छोटे-छोटे सफेद मोती जैसे दिखने वाला सबूदाना आखिर बनता कैसे है? क्या यह सीधे किसी पेड़ पर उगता है? आइए जानते हैं पेड़ से खाने तक सबूदाना बनने की पूरी प्रक्रिया।
सबूदाना किस पेड़ से बनता है?
असल में पारंपरिक सागो Sago Palm नाम के पेड़ से बनता है, जबकि भारत में जो सबूदाना सबसे ज्यादा मिलता है वह अधिकतर Cassava (टैपिओका) की जड़ से बनाया जाता है। कैसावा एक कंद (root crop) है जिसमें स्टार्च बहुत अधिक मात्रा में होता है। यही स्टार्च सबूदाना बनाने का मुख्य आधार होता है।
चरण 1: फसल की कटाई और जड़ निकालना
सबसे पहले कैसावा पौधे को खेत से उखाड़ा जाता है। इसके बाद उसकी मोटी जड़ों को अलग किया जाता है। इन जड़ों को साफ पानी से धोकर मिट्टी और गंदगी हटाई जाती है ताकि आगे की प्रक्रिया में शुद्ध स्टार्च मिल सके।
चरण 2: जड़ों को पीसकर स्टार्च निकालना
धोई गई जड़ों को मशीनों में डालकर बारीक पीसा जाता है। इस पेस्ट को पानी के साथ मिलाकर छाना जाता है। छानने से रेशे और ठोस कचरा अलग हो जाता है और नीचे सफेद स्टार्च वाला घोल जमा हो जाता है। यही स्टार्च सबूदाना बनाने का असली कच्चा माल होता है।
चरण 3: स्टार्च को जमाना और सुखाना
स्टार्च वाले घोल को कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाता है ताकि स्टार्च नीचे बैठ जाए। ऊपर का पानी निकाल दिया जाता है। इसके बाद गीले स्टार्च को सुखाने के लिए फैलाया जाता है। कई जगह यह प्रक्रिया धूप में की जाती है, जबकि फैक्ट्रियों में ड्रायर मशीन का उपयोग होता है।
चरण 4: छोटे मोती (Pearls) बनाना
अब सूखे स्टार्च को मशीन में डालकर हल्का गीला किया जाता है और घुमाया जाता है। इस प्रक्रिया में स्टार्च के छोटे-छोटे गोल दाने बनने लगते हैं। इन्हें छलनी से छानकर अलग-अलग साइज के मोती बनाए जाते हैं। यही कच्चा सबूदाना होता है।
चरण 5: भाप या गर्मी से पकाना
इन कच्चे मोतियों को भाप या हल्की गर्मी दी जाती है ताकि वे मजबूत हो जाएं और पककर पारदर्शी बनने लगें। इससे उनका आकार स्थिर हो जाता है और वे टूटते नहीं हैं।
चरण 6: अंतिम सुखाई (Drying)
अब इन मोतियों को दोबारा सुखाया जाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण चरण है क्योंकि सही तरीके से सुखाने पर ही सबूदाना लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। फैक्ट्री में यह काम हॉट एयर ड्रायर से होता है, जबकि छोटे उत्पादक धूप का इस्तेमाल करते हैं।
चरण 7: छंटाई और पैकिंग
पूरी तरह सूखने के बाद सबूदाना को मशीन से छांटा जाता है ताकि टूटे हुए या खराब दाने अलग हो जाएं। इसके बाद इन्हें वजन के हिसाब से पैक कर दिया जाता है और बाजार में भेज दिया जाता है।
खाने लायक कैसे बनता है?
बाजार से खरीदा गया सबूदाना सीधे नहीं खाया जाता। इसे पहले पानी में भिगोया जाता है। भिगोने पर यह फूलकर नरम हो जाता है और फिर इससे खिचड़ी, वडा या खीर बनाई जाती है। पकने के बाद यह हल्का पारदर्शी और मुलायम हो जाता है।
क्या सबूदाना सेहत के लिए अच्छा है?
सबूदाना में कार्बोहाइड्रेट बहुत ज्यादा होता है, इसलिए यह जल्दी ऊर्जा देता है। इसी कारण इसे व्रत में खाया जाता है। हालांकि इसमें प्रोटीन, फाइबर और विटामिन कम होते हैं, इसलिए रोज़ाना ज्यादा मात्रा में खाना संतुलित नहीं माना जाता। इसे मूंगफली, आलू या दही के साथ खाने से पोषण संतुलन बेहतर हो जाता है।
भारत में सबूदाना उत्पादन
भारत में तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर टैपिओका उगाया जाता है और वहीं से सबसे ज्यादा सबूदाना बनता है। कई फैक्ट्रियां आधुनिक मशीनों से बड़े स्तर पर उत्पादन करती हैं, जिससे पूरे देश में सप्लाई होती है।
निष्कर्ष
सबूदाना कोई साधारण खाद्य पदार्थ नहीं है, बल्कि यह खेत, फैक्ट्री और कई चरणों की मेहनत का परिणाम है। कैसावा की जड़ से स्टार्च निकालना, उसे मोती का आकार देना, पकाना और सुखाना — इन सभी प्रक्रियाओं के बाद ही यह हमारी प्लेट तक पहुंचता है। अगली बार जब आप सबूदाना खिचड़ी खाएं, तो याद रखें कि यह छोटे-छोटे मोती एक लंबी वैज्ञानिक और पारंपरिक प्रक्रिया से गुजरकर बने हैं।